Sonpur Mela: The main attraction of the fair

मनोरंजन : मेला का मुख्य आकर्षण

दिन न भर की गहमा-गहमी के बाद मेले पर मनोरंजन का चटकीला रंग चढ़ने लगता है। तमाम दुकानें रंग-बिरंगी कृत्रिम रोशनी से नहाने लगती हैं। यहाँ मनोरंजन के कई साधन देखने को मिलते हैं। व्यक्ति विशेष अपनी इच्छा के अनुसार इनका चयन कर आनंद उठा सकते हैं। मौत का कुआँ, नौटंकी, थियेटर, एयर रायफल शूटिंग, झूला, जादू के शो, कई तरह के करतब दिखाने वाले, कई तरह के झूले समेत अन्य कई खेल-खिलौने काफी संख्या में यहाँ उपलब्ध होते हैं।

राज्य के पर्यटन विभाग व कला एवं संस्कृति विभाग के अलावा जिला प्रशासन के द्वारा यहाँ प्रत्येक शाम सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें स्थानीय कलाकारों के अलावा देश भर से नामी-गिरामी कलाकार शिरकत करते हैं व अपनी कला से लोगों का मनोरंजन करते हैं। रामायण मंचन के भी कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। –

रोजमर्रा की जरूरतों के कई तरह के सामानों की यहाँ जबरदस्त बिक्री होती है। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न उत्पादों के स्टॉल यहाँ लगते हैं। फर्नीचर, घरेलू जरूरत के सामान, सजावटी वस्तु, कपड़े, शॉल, चादर, हस्तशिल्प आदि तमाम तरह के उत्पाद यहाँ मिलते हैं। मेले की लोकप्रियता को देखते हुए कुछ वर्षों से यहाँ कई ब्रांडेड कंपनियाँ भी अपना सामान बेचने के लिए स्टॉल लगाने लगी हैं। स्थानीय और पूरे राज्य की काश्तकारी, हस्तशिल्प और हथकरघा वाले उत्पादों के अलावा यहाँ गुजरात, हरियाणा, यू.पी., महाराष्ट्र, जम्मू- कश्मीर समेत अन्य राज्यों के व्यापारी भी आकर अपना स्टॉल लगाते हैं। नवम्बर-दिसंबर में आयोजित होने वाले इस मेले से ही राज्य में ठंड दस्तक देने लगती है। इसके मद्देनज़र यहाँ गर्म कपड़ों की बिक्री खासतौर से होती है।

ऊनी कपड़ों के बाद यह मेला लकड़ी के फर्नीचर के लिए भी खासतौर से पहचाना जाता है। लकड़ी पर बेहतरीन कारीगरी और शानदार नक्काशी वाले फर्नीचर यहाँ काफी दिखते हैं। कृषि कार्यों में प्रयोग होने वाले कई तरह के औजार और अन्य उपादानों की यहाँ अलग से प्रदर्शनी लगती है। इस प्रदर्शनी का आयोजन राज्य कृषि विभाग करता है। इस दौरान कृषि विशेषज्ञ या सलाहकार किसानों को फसलों, उनकी बीमारियों और बचाव की जानकारी देते हैं। इस वजह से बड़ी संख्या में किसान इस मेले में आते हैं। नव देह पंच तत्वों से निर्मित है मानव है। पशु-पक्षी एवं वृक्ष वनस्पतियों की संरचना में भी ये पंच तत्व सहभागी कारक हैं। हैं। इन सब का उद्भव एवं विकास जलतटीय परिवेश में मुक्ताकाशो उन्मुक्त वायु और सूर्य के ताप से समन्वित है। जल से दैहिक ताप संतुलित होने के कारण नदी स्नान को धार्मिक आचार से बांध कर रखा गया है। अतः लोक जीवन में गंगा स्नान, कमला स्नान, सरयू स्नान, पुस्करणी में स्नानादि का विधान विभिन्न मांगलिक अवसरों में विहित है। इनमें कार्तिक पूर्णिमा, माघी पूर्णिमा एवं गंगा दशहरा के अवसरों पर गंगा स्नान का लौकिक एवं शास्त्रीय विधान पुण्यप्रद माना गया है। इससे दैविक, दैहिक एवं भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है, ऐसी लोक मान्यता है, जबकि पौराणिक एवं लौकिक मान्यता में संगम तीर्थ स्नान का महत्व सर्वोपरि है।

प्रातः स्नान एवं सांध्य वेला में पुष्पाच्छादित दोने में प्रज्वलित दीप दान का प्रवाह जीवन एवं जगत को सात्विक ऊर्जा देता है। गंगा की आरती होती है ऐसा दृश्य गंगा तट पर देखना देश देशान्तर के धर्मपरायण लोगों के लिए कौतुहल का विषय बन गया है।

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