सोनपुर मेला का महत्व

सोनपुर का विशाल मेला बिहार के जनमन में काफी गहरा महत्व रखता है जो आंचलिकता, परंपरा और मनोरंजन का अद्भुत संगम है। पशु मेले के रूप में यह पूरे एशिया में सबसे बड़े मेले के तौर पर पहचाना जाता है। एक महीने तक चलने वाले इस मेले की शुरूआत प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन से होती है। सारण जिले के सोनपुर नामक स्थान पर गंडक और गंगा के पवित्र संगम पर सोनपुर मेले का अयोजन होता है। गंगा और गंडक के इस संगम स्थल पर कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर लोग पवित्र स्नान करते हैं, ताकि भगवान विष्णु की विशेष कृपा उन पर हो। कहते हैं सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य गंगा के पार से हाथियों और घोड़ों की खरीदारी के लिए यहाँ आया करते थे, संभवतः तभी से प्रतिवर्ष इस मेले का आयोजन किया जाता है।

इस मेले की विशिष्टता ने पूरी दुनिया में बिहार को खास पहचान दिलायी है। इसका कारण इसके पीछे जुड़ा पौराणिक-धार्मिक इतिहास है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान करने के लिए यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ एक दिन पूर्व से ही जमा होने लगती है। सुबह हैं की पहली किरण के साथ ही बड़ी संख्या में लोगों के गंगा और गंडक के संगम स्थल पर बने घाटों में स्नान करने का सिलसिला

शुरू हो जाता है। लोग पवित्र स्नान करने के बाद धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ शुरू करते हैं। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति पुण्य प्राप्त करने के लिए पवित्र स्नान करने में विश्वास रखता है। इस स्नान के बाद ही लोग मेले की रौनक देखने के लिए निकलते हैं। आस-पास के लोगों की रोजमर्रा की जीवन शैली में यह मेला सिर्फ उत्सवी माहौल ही लेकर नहीं आता है, बल्कि धर्म और अध्यात्म को भी अपने में समाहित करने के लिए आता है।

भारत में दो या अधिक नदियों के मिलने वाले स्थल को ‘संगम’ कहा जाता है। संस्कृत के इस अति विशेष शब्द के साथ कई परंपराओं का उद्गम भी जुड़ा हुआ है। जहाँ दो नदियाँ मिलकर इस संगम को परिभाषित करती हैं, वहीं दूसरी तरफ दोनों नदियाँ जिन-जिन संस्कृतियों को छूती हुई आती हैं, उनकी विशिष्टताओं का भी मेल यहाँ होता है। इसी कारण भारत देश के इन संगम स्थलों के पास कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान के आयोजन व सामूहिक स्नान की पंरपरा है, जो कई विभेदों को खुद में समा लेती हैं। ऐसी ही जीती-जागती परंपरा का एक सबसे सशक्त उदाहरण है, सोनपुर मेला।

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