हरिहरनाथ मंदिर
यहाँ स्थित हरिहरनाथ मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु (हरि) की प्रतिमा व भगवान शंकर शिवलिंग स्वरूप में स्थापित है। हरिहरनाथ मंदिर में काफी बड़ा जन सैलाब दर्शन करने के लिए उमड़ता है। हरिहर के जयकारे से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है। यह भी एक वजह है, जिससे पूरे क्षेत्र को हरिहर क्षेत्र कहा जाता है। सोनपुर मेले का एक दूसरा नाम हरिहर क्षेत्र मेला भी है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम में सुबह स्नान करने के बाद मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं।
किराये पर एक नाव लेकर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं के स्नान के मनोरम दृश्य का आनंद नजदीक से उठाया जा सकता है।
एक मान्यता के मुताबिक यहाँ मौजूद मंदिर को भगवान राम ने उस समय बनवाया था, जब वे सीता के स्वयंवर में शामिल होने के लिए जनकपुर जा रहे थे। हालांकि रामायण में इस तरह की किसी कथा या प्रसंग का कोई जिक्र नहीं मिलता है। इस क्षेत्र के आस-पास रामायणकाल के अलग- अलग कालखंडों से जुड़े कई मंदिरों का जिक्र मिलता है। हरिहरनाथ मंदिर में राम से जुड़े कई चिह्न मौजूद हैं।
वर्तमान में मौजूद मंदिर का ढांचा बहुत पुराना नहीं है। इस बेहतरीन वास्तुशिल्प वाले मंदिर का निर्माण राजा रामनारायण ने मुगलकाल के दौरान करवाया था। कुछ समय पहले बिरला ने इसका फिर से निर्माण करवाया था।
सोनपुर मेले की शुरूआत कब से हुई, इस बारे में ठीक से नहीं कहा जा सकता। इस मेले का आयोजन प्राचीनकाल से हो रहा है। इस मेले में लगभग 2500 वर्ष पहले से लोग पशुओं की खरीद-बिक्री करने और अदला-बदली करने के लिए जुटते थे। वे अपनी जरूरत के मुताबिक पशुओं को लेकर यहाँ से जाते थे। आदिकाल में महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य इस मेले से हाथी और घोड़े खरीद कर ले जाया करते थे।
युद्ध में लड़ने वाले ये सभी बेहद दमदार हाथी और घोड़े हुआ करते थे, जिन्होंने इतिहास में पहली बार मौर्य सम्राट को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी विजय पताका लहराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
पुराण में प्रचलित एक कथा के अनुसार, इसी स्थान पर हाथियों के राजा गजेन्द्र के प्राणों की रक्षा भगवान विष्णु ने मगरमच्छ से की थी। कहा जाता है कि गंधर्व राजा हुहु’ हुआ करते थे, जो अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार वह किसी गंधर्व कन्या के साथ स्नान करने झील में गये और अति उत्साह में उनका पैर एक ऋषि को छू गया। मगर ‘हुहु’ को इसका भान नहीं रहा और वह उस कन्या के साथ ठिठोलियाँ करता रहा, जिससे वहाँ स्नान करते हुए ऋषि को उन पर क्रोध आ गया और उसी क्षण उन्होंने गंधर्व राजा ‘हुहु’ को मगरमच्छ बन जाने का श्राप दे दिया। दूसरी तरफ इसी स्थान सोनपुर में मौजूद घने जंगलों में गजेन्द्र रहा करते थे, जो वास्तव में बहुत ही कोमल स्वभाव वाले राजा इंद्रायमना थे। लेकिन एक बार उन्होंने अगस्त्य मुनि का अनजाने में अपमान कर डाला। जब अगस्त्य मुनि ध्यान की अवस्था में लीन थे, तभी राजा इंद्रायमना उनके आश्रम में पहुँचकर भी उनको नहीं पहचान पाए, जिसके कारण महर्षि अगस्त्य ने राजा को श्राप देकर हाथी बना दिया। बाद में वे हाथियों के झुंड के राजा बन गये।
एक दिन जब गजेन्द्र पानी पीने के लिए गंडक नदी में गये तो अचानक उन पर एक मगरमच्छ ने हमला कर दिया। इन दोनों महान राजाओं के बीच बिना हार-जीत के कई वर्षों तक युद्ध चला, कितु अंत में हाथी राजा गजेन्द्र ने भगवान विष्णु ‘हरि’ से मदद के लिए गुहार लगाई। भगवान ने प्रकट होकर मगरमच्छ का अपने चक्र से वध कर उसे श्राप मुक्त किया। भगवान विष्णु के आशीर्वाद से राजा इंद्रायमना को भी श्राप से मुक्ति मिल गई।